Wednesday, 13 July 2016

वह समय

काश पुनः वह समय धरा पर, उसी रूप में आ जाता
मनभावन सावन का मौसम, फिर धरती पर छा जाता।

अपने दर्द को मुझसे बांटा, पर मेरा प्रतिकार किया
प्रेम नहीं था मुझसे फिर भी, मुझको वह अधिकार दिया।

वसुंधरा का हृदय चीर कर, प्रेम बीज था बो डाला
बिना किसी के शंका के उस दिन, पी डाला था विष प्याला।

तिमिर मिटाने को जब भी मैं, 'उन' लोगों से लड़ता था
अम्बर में तब प्रचुर प्रेम का, दिनकर ऊपर चढ़ता था।

उच्छृंखल से गौरव को, हां तुमने ही तो योग्य बनाया
लेकिन नहीं समझ पाया मैं, जीवन की वह कोरी माया।

काश पुनः वह समय धरा पर, नए रूप में आ जाता
जिससे चन्द्रप्रभा का वैभव, परमधाम में छा जाता।