गृहशोभा की प्रथम किरण हो, प्रज्ञा हो अभिलाषा में
प्रेम, समर्पण, निष्ठ भाव की, अर्थ तुम्हीं परिभाषा में
अंबर का विस्तार तुम्ही हो, सागर सी गहरी हो तुम
वैकल्पिक तुम मार्ग नहीं हो, निशा स्वप्न की प्रहरी तुम
जीवन का तुम अटल सत्य हो, मृगनयनी कस्तूरी हो
प्रेम भावना अर्पण हो तुम, नवरस की तुम धुरी हो...
प्रेम, समर्पण, निष्ठ भाव की, अर्थ तुम्हीं परिभाषा में
अंबर का विस्तार तुम्ही हो, सागर सी गहरी हो तुम
वैकल्पिक तुम मार्ग नहीं हो, निशा स्वप्न की प्रहरी तुम
जीवन का तुम अटल सत्य हो, मृगनयनी कस्तूरी हो
प्रेम भावना अर्पण हो तुम, नवरस की तुम धुरी हो...