Sunday, 28 April 2019

नयन सेज पर एक स्वप्न है...

जब तक भोली जनता को, वे छल से शांत कराएंगे
तब तक बन रण के कान्हा हम, गीता का पाठ पढ़ाएंगे

वे मूर्ख समझकर हम सबको, नैसर्गिक झूठ दिखाते हैं
आनंद भाव से सत्य मानकर, हम उनके ही गुण गाते हैं

आडंबर वाली वे रस्में, अब और नहीं सह पाएंगे
अनुकूल रहे हम सदा सत्य के, स्फूर्ति पुनः वह लाएंगे

सत्ता के चरण पखार हमें, ना पुरस्कार की आशा है
बस बने प्रतिष्ठा भारत की, अभियोग सभी सह जाएंगे

नयन सेज पर एक स्वप्न है, आर्य पुनः हम बन जाएं
तुम छेड़ोगे यदि इसको तो, अरिहंत रूप अपनाएंगे

हैं शिव हमारे हर कदम में, विषपान से घबराते नहीं
हो तिमिर यदि गृहकलश में, चुप बैठ हम पाते नहीं,
स्वयं जलकर उस अंधेरे का सुखद वध हम करेंगे
प्राणदानी, ब्रह्म दीपक, बन सदा यूं ही जलेंगे।

मिली जब से तुम

प्रेम बनकर मुझे हो मिली जबसे तुम,
लगता जैसे कि जीवन सफल हो गया

बंधनों के ही खंडन की वह एक कथा,
दूर जाने के डर की अजब सी व्यथा
अनगढ़े अनकहे मोतियों की सिसक
पूर्ण कर दी हृदय में बसी वह कसक

प्रेम की इस धरा में तुम्हीं हो प्रथम
बन के राधा मेरी, तुम बना लो किशन

दीप जलते रहें, शब्द बनते रहें
छांव वृक्षों तले, हम भी पलते रहें
मन भी तब शांत हो, ना ही सूत्रान्त हो
प्रेम की इस कहानी को आयाम दो