Sunday, 28 April 2019

मिली जब से तुम

प्रेम बनकर मुझे हो मिली जबसे तुम,
लगता जैसे कि जीवन सफल हो गया

बंधनों के ही खंडन की वह एक कथा,
दूर जाने के डर की अजब सी व्यथा
अनगढ़े अनकहे मोतियों की सिसक
पूर्ण कर दी हृदय में बसी वह कसक

प्रेम की इस धरा में तुम्हीं हो प्रथम
बन के राधा मेरी, तुम बना लो किशन

दीप जलते रहें, शब्द बनते रहें
छांव वृक्षों तले, हम भी पलते रहें
मन भी तब शांत हो, ना ही सूत्रान्त हो
प्रेम की इस कहानी को आयाम दो

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