उस विषमता भावना ने, खंडित किया वैदूर्य सा
नेह के स्पर्श मन में, स्वर हुआ वह तूर्य सा
उन व्यथाओं की कसक से, पूर्य वांछित रह गया था
देह जूठी, प्राण पावन, सूर्य तब कलुषित हुआ था
क्या मिलन था उस घड़ी में, डूब कर खोए थे तुम
उस विकलता की घड़ी में, हार कर सोए थे हम
था हमारा स्वप्न कि तुम, चिर जियो अर्धांगिनी बन
मौन होकर आलिंगनों में, फिर बनो वामांगिनी तुम
किंतु देखो चाह मेरी, सत्य से बिल्कुल अलग थी
छल था बस उसमें बसा वह, जीव से बिल्कुल विलग थी
है यही बस कामना अब, आवरण समृद्ध हो
तुम तो मेरी हो न पाई, प्रेम अब अनिरुद्ध हो...
नेह के स्पर्श मन में, स्वर हुआ वह तूर्य सा
उन व्यथाओं की कसक से, पूर्य वांछित रह गया था
देह जूठी, प्राण पावन, सूर्य तब कलुषित हुआ था
क्या मिलन था उस घड़ी में, डूब कर खोए थे तुम
उस विकलता की घड़ी में, हार कर सोए थे हम
था हमारा स्वप्न कि तुम, चिर जियो अर्धांगिनी बन
मौन होकर आलिंगनों में, फिर बनो वामांगिनी तुम
किंतु देखो चाह मेरी, सत्य से बिल्कुल अलग थी
छल था बस उसमें बसा वह, जीव से बिल्कुल विलग थी
है यही बस कामना अब, आवरण समृद्ध हो
तुम तो मेरी हो न पाई, प्रेम अब अनिरुद्ध हो...
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