Saturday, 3 November 2018

मैं तुम्हें जब खोजता हूं

निशा के अंतिम पहर में, मैं तुम्हें जब खोजता हूं
राह की वीरानियों में, मैं तुम्हें जब सोचता हूं

सूर्य की अथ दीप्ति सी तुम, प्रीत का त्योहार हो तुम
नीर लेकर मैं नयन में, कह रहा विस्तार हो तुम

तुम तुम्हारे ही हृदय की, एक अविचल कामना हो
प्रेम परिचारक जनों की , तुम कुटिल अवमानना हो

जिस जलधि में अनगढ़े से मोतियों की ज्वार धारा
छद्म कलुषित अर्णवों में, जीव जीता मर न पाया
उस उदधि की चारुता से, शर्बरी से, नेह कर बैठा हूं मैं
इस प्रणय पर नीरदों की, वृष्टि में बहता हूं मैं

कामनाओं की धरा पर, प्रीत की अनुभूति थी तुम
योग के आनन्द की, ही प्रथम संभूति थी तुम
आसक्त थी मुझको तुम्हारी, मधुमास सी उस रम्यता से
किंतु छल से बच न पाया, दंभ निर्मित जन्यता से।

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