Wednesday, 10 August 2016

जो तुमने विश्वास भरा...

जीवन के इस कठिन दौर में, जबसे तुमको पाया है
प्रेम पुंज का सूर्य रूप तब, उतर धरा पर आया है।

थी मेरी बस यही कामना, जीवन का आधार बनो तुम
अमिट छाप देकर अतीत की, फिर मेरा संसार बनो तुम।

उस अंबर की परंपरा से, जैसे चांद विरह करता है
तोड़ अमावस की बेड़ी को, पुनः नया यौवन भरता है।

वसुंधरा की इस माटी में, जैसे अप्रतिम प्रेम धरा
धरा रह गया मन में तब वह, जो तुमने विश्वास भरा।

प्रीति-नीति के चक्रों को भी, तोड़ तुम्हें अपनाता हूं
अखिल विश्व का गौरव बनकर, नई कहानी गाता हूं।

फंसकर हार गया था मैं...



प्रेम नहीं था, था मात्र छलावा
जो तुम मुझको दिखलाती थी
थोड़ा हंसकर, फिर मुस्काकर
दिल में बस तुम जाती थी।

तेरे मेरे विरह राग को,
जब भी मैंने गाया था
नयन खुले थे फिर भी उनमें
स्वप्न एक तब आया था।

मेरी हर अभिलाषा में,
प्रश्न मात्र वह होता था
जीवन की परिभाषा में,
निश्छल प्रेम मैं बोता था।

नीति -रीति के व्यूहों से भी,
लड़कर पार गया था मैं
पर तेरी-उसकी मिली भगत में,
फंसकर हार गया था मैं।

जब पापा से ठन जाती है...


यश का दीपक वसुंधरा से, अंबर चढ़ने लगता है,
जीवन के उस शून्य दौर में, प्रेम पुष्प जब खिलता है।

जीवन रूपी व्यथा-कथा को, जब वह सुनने आ जाता है,
अर्ध दुःखों को नयनों में भर, कष्ट मुक्त कर जाता है।

कदम धरा पर रहते तो हैं, मगर गगन पर चलते हैं,
कष्ट भरे जीवन चक्रों में, स्वप्न उसी के पलते हैं।

एक नई जीवन रेखा बन, जब वह जीवन में आती है,
जीवन रूपी आम्र वृक्ष पर, पुनः कली खिल जाती है।

उसी प्रेम के वशीभूत हो, जब पापा से ठन जाती है,
तब शब्दों के जोड़-तोड़ से, फिर कविता बन जाती है।