Wednesday, 10 August 2016

जब पापा से ठन जाती है...


यश का दीपक वसुंधरा से, अंबर चढ़ने लगता है,
जीवन के उस शून्य दौर में, प्रेम पुष्प जब खिलता है।

जीवन रूपी व्यथा-कथा को, जब वह सुनने आ जाता है,
अर्ध दुःखों को नयनों में भर, कष्ट मुक्त कर जाता है।

कदम धरा पर रहते तो हैं, मगर गगन पर चलते हैं,
कष्ट भरे जीवन चक्रों में, स्वप्न उसी के पलते हैं।

एक नई जीवन रेखा बन, जब वह जीवन में आती है,
जीवन रूपी आम्र वृक्ष पर, पुनः कली खिल जाती है।

उसी प्रेम के वशीभूत हो, जब पापा से ठन जाती है,
तब शब्दों के जोड़-तोड़ से, फिर कविता बन जाती है।

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