Saturday, 14 January 2017

गीत बनकर मेरे तुम लबों पर बसो

गीत बनकर मेरे तुम लबों पर बसो,
गुनगुनाकर तुम्हें मैं अमरता भी दूं।

लक्ष्य था प्रेम तो मैंने तुमको चुना...
बोलकर हां पुनः प्रेम पूजक बना

साथ थी तुम तो खुद में खबर बन गई
दूर जाकर मुझे बेखबर कर दिया।

दिल ने चाहा बहुत तुमको अपना कहूं
तुमने मिलकर गले सब खत़म कर दिया...

चुना जब तुम्हें फिर तो ऐसा लगा 
जैसे अंबर-धरा का मिलन हो गया... 

दीप बनकर अंधेरे में तब तक जलो,
राह जब तक मोहब्बत को मिलती नहीं।

प्रेम की वह पुनः तुम कहानी बनो
जिसकी बुनियाद में साज सजता रहे...

तोड़ मजहब के उन बंधनों को मिलो
मिल के जिनसे गति इस धरा को मिले....

मिल के फिर से कहानी में बस जाओ तुम
प्यार की यश पताका को आकाश दो...

कल्पना लोक में रुक्मणी सी दिखी
पास पहुंचा तो पाया कि राधा हो तुम....

प्रेम अंकुर के अंगों से छूकर तुम्हें
राग विच्छेद के गीत लिखते रहे

शून्य के उस अघोषित निहितार्थ में
सिर्फ तुम्हें और तुम्हें खोजते ही रहे...

चेतन से अचेतन की उस दौड़ में
खुद को खोकर तुम्हें गुनगुनाते रहे...

था अजब दौर था वो मोहब्बत का भी
दिलासा देते रहे, मुस्कुराते रहे...

No comments:

Post a Comment