Sunday, 9 April 2017

तब नया गीत था लिख डाला

कल जब मैंने तुमको देखा, इक नया था गीत लिख डाला,
उन्हीं पुरानी यादों के संग, पी डाला था विष प्याला।

जीवन के सब लक्ष्यों को तज, तुमको ही तो लक्ष्य बनाया
लेकिन प्रणय देवता की, इच्छा से पार नहीं पाया।

खुदा एक है तुम कहती थी, मैं भी तो शिव पूजक था
प्रेम हमारा जाति-धर्म के, चक्रव्यूह से ऊपर था।

देवतुल्य तुमको था समझा, तभी तो तुमसे प्रेम किया
बिना कहे साधक की भांति, जीवन अपना तुम्हें दिया।

साथ नहीं थी तुम मेरे तो, घुट-घुट कर मैं जीता था
बसा तुम्हें स्वप्नों में अपने, तुम्हें बनाया गीता था।

लगता था कि तुम आओगी, आकर फिर से तुम भाओगी
डूब कल्पना के सागर में, हर पल तुमको लिखता था।

भ्रम के भम्रर जाल में फंसकर, कितना कुछ था लिख डाला
अनकही कहानी कहकर मैंने, पी डाला था विष प्याला।

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