वो बोली,
तुम हो मेरे जग का सुन्दर लेकिन अकथित अर्थ
बिना तुम्हारे हो जायेगा, मेरा जीवन बिलकुल व्यर्थ।
मैं बोला,
देकर तुम्हें नाम मैं अपना, तुममें घुलमिल जाऊंगा
तोड़ मजहबी दीवारों को, नई कथा लिख जाऊंगा।
फिर बोली वह,
मम्मी-पापा कहते हैं कि तुम काफिर से लगते हो
हो सच में गर तुम काफिर तो दिल में क्यों तुम बसते हो?
उसका अजब प्रश्न सुनकर मैं कुछ पल तो खामोश रहा
उसकी ललाट पर चिंता की रेखाएं देख फिर मैंने कहा
मैं बोला,
जब प्रेम ब्रह्म है अपना तो फिर, क्यों ऐसे घबराती हो,
खुद भी चिंतित रहती हो और मुझे कष्ट दे जाती हो।
शायद मेरी इन बातों से मन में उसके विश्वास जगा,
उसी प्रेम के वशीभूत हो, मुझे मिली एक नई कथा।
वह बोली,
सुनो गौर से गौरव अब तुम, मुझे पढ़ोगे, मुझे लिखोगे और मुझे अपनाओगे
मुझे क्वीन कहते हो तो, इसका अर्थ बतलाओगे
फिर आगे बोली,
मुझको आशा है ये तुमसे, मुझे अमर कर जाओगे,
अपने शब्दों की ताकत से, मजहबी दूरियां मिटाओगे।
है मेरी अब यही कामना, उसके स्वप्न साकार करूँ मैं,
माँ हिंदी को जीवन में रच, विघटन को अब दूर करूँ मैं।
प्रेम पुंज का दीपक बनकर, उसे अमरता दूंगा मैं
ख़ुशी और खुशबू भरकर फिर, हर दिन गीत लिखूंगा मैं।
तुम हो मेरे जग का सुन्दर लेकिन अकथित अर्थ
बिना तुम्हारे हो जायेगा, मेरा जीवन बिलकुल व्यर्थ।
मैं बोला,
देकर तुम्हें नाम मैं अपना, तुममें घुलमिल जाऊंगा
तोड़ मजहबी दीवारों को, नई कथा लिख जाऊंगा।
फिर बोली वह,
मम्मी-पापा कहते हैं कि तुम काफिर से लगते हो
हो सच में गर तुम काफिर तो दिल में क्यों तुम बसते हो?
उसका अजब प्रश्न सुनकर मैं कुछ पल तो खामोश रहा
उसकी ललाट पर चिंता की रेखाएं देख फिर मैंने कहा
मैं बोला,
जब प्रेम ब्रह्म है अपना तो फिर, क्यों ऐसे घबराती हो,
खुद भी चिंतित रहती हो और मुझे कष्ट दे जाती हो।
शायद मेरी इन बातों से मन में उसके विश्वास जगा,
उसी प्रेम के वशीभूत हो, मुझे मिली एक नई कथा।
वह बोली,
सुनो गौर से गौरव अब तुम, मुझे पढ़ोगे, मुझे लिखोगे और मुझे अपनाओगे
मुझे क्वीन कहते हो तो, इसका अर्थ बतलाओगे
फिर आगे बोली,
मुझको आशा है ये तुमसे, मुझे अमर कर जाओगे,
अपने शब्दों की ताकत से, मजहबी दूरियां मिटाओगे।
है मेरी अब यही कामना, उसके स्वप्न साकार करूँ मैं,
माँ हिंदी को जीवन में रच, विघटन को अब दूर करूँ मैं।
प्रेम पुंज का दीपक बनकर, उसे अमरता दूंगा मैं
ख़ुशी और खुशबू भरकर फिर, हर दिन गीत लिखूंगा मैं।
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