मेरी इस कहानी का आधार हो, गौर से देखो तो तुम ही संसार हो।
अकल्पित, अकिंचन, द्रवित प्रेम के, शुभ्र अंचल की तुम ही हरिद्वार हो...
उस निशा की अंधेरी गली में दिखी, दीप्ती रमणी का जैसे करुण सार हो,
विश्व के सूर्य की कांतिमय रोशनी, मानवी श्रेष्ठता का ही विस्तार हो
मिल के बिछड़ी, बिछड़ कर पुनः तुम मिली, नवगीत की तुम अलंकार हो
ख्वाहिशों के अधूरे मिलन में कभी, देखते-देखते तुम ही श्रृंगार हो
दीर्घ स्वप्नों के कुल में समर्पण लिए, प्रीति इच्छा का जैसे अवतार हो
तोड़ बंधन मिली हो मुझे जब से तुम, लगता जैसे कोई यह चमत्कार हो
राम से मांगता था कि कोई मिले, जिसका मुझसे प्रथम ही सरोकार हो
मिल गई तुम तो मुझको है ऐसा लगा, मेरे राम का तुम उपहार हो
अकल्पित, अकिंचन, द्रवित प्रेम के, शुभ्र अंचल की तुम ही हरिद्वार हो...
उस निशा की अंधेरी गली में दिखी, दीप्ती रमणी का जैसे करुण सार हो,
विश्व के सूर्य की कांतिमय रोशनी, मानवी श्रेष्ठता का ही विस्तार हो
मिल के बिछड़ी, बिछड़ कर पुनः तुम मिली, नवगीत की तुम अलंकार हो
ख्वाहिशों के अधूरे मिलन में कभी, देखते-देखते तुम ही श्रृंगार हो
दीर्घ स्वप्नों के कुल में समर्पण लिए, प्रीति इच्छा का जैसे अवतार हो
तोड़ बंधन मिली हो मुझे जब से तुम, लगता जैसे कोई यह चमत्कार हो
राम से मांगता था कि कोई मिले, जिसका मुझसे प्रथम ही सरोकार हो
मिल गई तुम तो मुझको है ऐसा लगा, मेरे राम का तुम उपहार हो
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