Tuesday, 30 January 2018

कहानी उस रात की

थी अजब सी कहानी, भी उस रात की
खोकर उसी में, भी छलकी थी तुम

प्रेम कुंदन के मदमस्त, अश्रु जल तले
डूब उसमें, मोहब्बत सी बरसी थी तुम

थीं विधाएं सरस, राग जैसी वही
बर्फ जैसी वहीं, पिघली थी तुम

प्रीति की वह सुधा, याचना सीप सी
सो गई रात थी, खूब जागी थी तुम

चूढ़ियों की खनक, और हृदय की कसक
नेह स्पर्श में, मुस्कुराई थी तुम

प्रश्न था हर्ष का, मन में संघर्ष था
सिलवटों में प्रथम, वह उत्कर्ष था

मुक्तिधामों के उन, आसरों में बंधे
चाहतों के शिविर में, छाई थी तुम

थी अजब सी कहानी, भी उस रात की
हार के क्षार से, विदाई थी तुम

Monday, 29 January 2018

मेरे राम का तुम उपहार हो

मेरी इस कहानी का आधार हो, गौर से देखो तो तुम ही संसार हो।
अकल्पित, अकिंचन, द्रवित प्रेम के, शुभ्र अंचल की तुम ही हरिद्वार हो...

उस निशा की अंधेरी गली में दिखी, दीप्ती रमणी का जैसे करुण सार हो,
विश्व के सूर्य की कांतिमय रोशनी, मानवी श्रेष्ठता का ही विस्तार हो

मिल के बिछड़ी, बिछड़ कर पुनः तुम मिली, नवगीत की तुम अलंकार हो
ख्वाहिशों के अधूरे मिलन में कभी, देखते-देखते तुम ही श्रृंगार हो 

दीर्घ स्वप्नों के कुल में समर्पण लिए, प्रीति इच्छा का जैसे अवतार हो
तोड़ बंधन मिली हो मुझे जब से तुम, लगता जैसे कोई यह चमत्कार हो

राम से मांगता था कि कोई मिले, जिसका मुझसे प्रथम ही सरोकार हो
मिल गई तुम तो मुझको है ऐसा लगा, मेरे राम का तुम उपहार हो