Sunday, 9 April 2017

वो बोली...

वो बोली, 
तुम हो मेरे जग का सुन्दर लेकिन अकथित अर्थ
बिना तुम्हारे हो जायेगा, मेरा जीवन बिलकुल व्यर्थ।

मैं बोला, 
देकर तुम्हें नाम मैं अपना, तुममें घुलमिल जाऊंगा
तोड़ मजहबी दीवारों को, नई कथा लिख जाऊंगा।

फिर बोली वह,
मम्मी-पापा कहते हैं कि तुम काफिर से लगते हो
हो सच में गर तुम काफिर तो दिल में क्यों तुम बसते हो?

उसका अजब प्रश्न सुनकर मैं कुछ पल तो खामोश रहा
उसकी ललाट पर चिंता की रेखाएं देख फिर मैंने कहा

मैं बोला,
जब प्रेम ब्रह्म है अपना तो फिर, क्यों ऐसे घबराती हो,
खुद भी चिंतित रहती हो और मुझे कष्ट दे जाती हो।

शायद मेरी इन बातों से मन में उसके विश्वास जगा,
उसी प्रेम के वशीभूत हो, मुझे मिली एक नई कथा।

वह बोली,
सुनो गौर से गौरव अब तुम, मुझे पढ़ोगे, मुझे लिखोगे और मुझे अपनाओगे
मुझे क्वीन कहते हो तो, इसका अर्थ बतलाओगे
फिर आगे बोली,
मुझको आशा है ये तुमसे, मुझे अमर कर जाओगे,
अपने शब्दों की ताकत से, मजहबी दूरियां मिटाओगे।

है मेरी अब यही कामना, उसके स्वप्न साकार करूँ मैं,
माँ हिंदी को जीवन में रच, विघटन को अब दूर करूँ मैं।

प्रेम पुंज का दीपक बनकर, उसे अमरता दूंगा मैं
ख़ुशी और खुशबू भरकर फिर, हर दिन गीत लिखूंगा मैं।

तब नया गीत था लिख डाला

कल जब मैंने तुमको देखा, इक नया था गीत लिख डाला,
उन्हीं पुरानी यादों के संग, पी डाला था विष प्याला।

जीवन के सब लक्ष्यों को तज, तुमको ही तो लक्ष्य बनाया
लेकिन प्रणय देवता की, इच्छा से पार नहीं पाया।

खुदा एक है तुम कहती थी, मैं भी तो शिव पूजक था
प्रेम हमारा जाति-धर्म के, चक्रव्यूह से ऊपर था।

देवतुल्य तुमको था समझा, तभी तो तुमसे प्रेम किया
बिना कहे साधक की भांति, जीवन अपना तुम्हें दिया।

साथ नहीं थी तुम मेरे तो, घुट-घुट कर मैं जीता था
बसा तुम्हें स्वप्नों में अपने, तुम्हें बनाया गीता था।

लगता था कि तुम आओगी, आकर फिर से तुम भाओगी
डूब कल्पना के सागर में, हर पल तुमको लिखता था।

भ्रम के भम्रर जाल में फंसकर, कितना कुछ था लिख डाला
अनकही कहानी कहकर मैंने, पी डाला था विष प्याला।

Saturday, 14 January 2017

गीत बनकर मेरे तुम लबों पर बसो

गीत बनकर मेरे तुम लबों पर बसो,
गुनगुनाकर तुम्हें मैं अमरता भी दूं।

लक्ष्य था प्रेम तो मैंने तुमको चुना...
बोलकर हां पुनः प्रेम पूजक बना

साथ थी तुम तो खुद में खबर बन गई
दूर जाकर मुझे बेखबर कर दिया।

दिल ने चाहा बहुत तुमको अपना कहूं
तुमने मिलकर गले सब खत़म कर दिया...

चुना जब तुम्हें फिर तो ऐसा लगा 
जैसे अंबर-धरा का मिलन हो गया... 

दीप बनकर अंधेरे में तब तक जलो,
राह जब तक मोहब्बत को मिलती नहीं।

प्रेम की वह पुनः तुम कहानी बनो
जिसकी बुनियाद में साज सजता रहे...

तोड़ मजहब के उन बंधनों को मिलो
मिल के जिनसे गति इस धरा को मिले....

मिल के फिर से कहानी में बस जाओ तुम
प्यार की यश पताका को आकाश दो...

कल्पना लोक में रुक्मणी सी दिखी
पास पहुंचा तो पाया कि राधा हो तुम....

प्रेम अंकुर के अंगों से छूकर तुम्हें
राग विच्छेद के गीत लिखते रहे

शून्य के उस अघोषित निहितार्थ में
सिर्फ तुम्हें और तुम्हें खोजते ही रहे...

चेतन से अचेतन की उस दौड़ में
खुद को खोकर तुम्हें गुनगुनाते रहे...

था अजब दौर था वो मोहब्बत का भी
दिलासा देते रहे, मुस्कुराते रहे...