Friday, 15 April 2016

बस तुम याद आती हो...

इस अँधेरी रात में बस तुम याद आती हो
आँखें बंद करता हूँ तो तुम ही तो सताती हो

कड़कती धूप से लेकर महकती शाम तक
क्यों मेरा नाम लिख लिख कर मिटाती हो

मेरी आँखों के समन्दर में बस तुम्हारा नाम ही तो है
क्यों किसी बहाने से न तुम मुझ तक अब आती हो।

क्या जल्दी थी मझसे दूर जाकर घर बसाने की
क्या जल्दी है मुझे इतनी जल्दी भुलाने की।

तेरी बातें लिखता था तो कहती थी कि मेरा नाम मत लिखना,
मेरा नाम लिखकर तुम मुझे बदनाम मत करना

कहा था छोड़ दूंगा लिखना जब तक तुम न चाहोगी
आंखों के इशारों से जब तक ना पुकारोगी।

पहाड़ो कि रानी पे जब तुमको बुलाया था
हँसकर तुमने न आने को मजबूरी बताया था

क्या मालूम था मुझको कि तुमने तो बस
बहाना कर के मुझसे पीछा छुड़ाया था।

उस रोज उगते सूरज ने बस यही एहसास दिलाया था
कि ज्यादा शिद्दत से किसी ने तुमको बुलाया था।

इरादा था तुम्हें दिल में बसाऊंगा,
तुम्हें रानी बना करके पलकों पर बिठाउँगा।

अँधेरा दूर करने को मैं सूरज बन गया था
तेरे साथ चलने को मैं निशा से मिल गया था।

इस धरा पर सूरज और निशा का मेल हो नहीं सकता,
और गर मिल जाए सूरज-निशा तो ये जीवन चल नहीं सकता।

जीवन के लिए सूरज का निकलना जरुरी है
और सूरज निकलने को निशा का ढ़लना जरूरी है।

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