किसने तुमको याद किया है, जब तुम यह जानोगी
शायद हृदय विखंडित होगा, जब हमको पहचानोगी।
हृदय प्रफुल्लित हुआ सोचकर, तुम अब आने वाली हो
मन विचलित है उसे भोगकर, तुम 'उसको' भाने वाली हो।
कैसा अजब प्रेम था तुमसे, मन में बस तुम बसती थी
कैसा भाव जुड़ा था तुमसे, जब तुम खुलकर हँसती थी।
उसी पुरातन प्रेम से रक्षित, जीवन की अभिलाषा है
तुममें घुलकर उसे बनाऊँ, नाम की जो परिभाषा है।
इसी लक्ष्य से शिखर सजाकर, अब भी तुमको लिखता हूँ
पर यह मत समझो तन सुंदरता, पर मिटता रहता हूँ।
राष्ट्र वंदना परम् अभी भी, जीवन का आधार वही है
भारत को बल देने वाली, सरल ज्ञान की प्यास वही है।
समर वही है अंधियारों से, सावरकर की आस वही है
प्रेम वही है कान्हा जैसा, सीता का विश्वास वही है।
यही राष्ट्र अब विश्वगुरु बन, सबका तमस मिटाएगा
योग, प्रेम, अध्यात्म सिखाकर, सबके मन को भाएगा
शायद हृदय विखंडित होगा, जब हमको पहचानोगी।
हृदय प्रफुल्लित हुआ सोचकर, तुम अब आने वाली हो
मन विचलित है उसे भोगकर, तुम 'उसको' भाने वाली हो।
कैसा अजब प्रेम था तुमसे, मन में बस तुम बसती थी
कैसा भाव जुड़ा था तुमसे, जब तुम खुलकर हँसती थी।
उसी पुरातन प्रेम से रक्षित, जीवन की अभिलाषा है
तुममें घुलकर उसे बनाऊँ, नाम की जो परिभाषा है।
इसी लक्ष्य से शिखर सजाकर, अब भी तुमको लिखता हूँ
पर यह मत समझो तन सुंदरता, पर मिटता रहता हूँ।
राष्ट्र वंदना परम् अभी भी, जीवन का आधार वही है
भारत को बल देने वाली, सरल ज्ञान की प्यास वही है।
समर वही है अंधियारों से, सावरकर की आस वही है
प्रेम वही है कान्हा जैसा, सीता का विश्वास वही है।
यही राष्ट्र अब विश्वगुरु बन, सबका तमस मिटाएगा
योग, प्रेम, अध्यात्म सिखाकर, सबके मन को भाएगा
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