Sunday, 11 November 2018

मेरी कामना

उस विषमता भावना ने, खंडित किया वैदूर्य सा
नेह के स्पर्श मन में, स्वर हुआ वह तूर्य सा

उन व्यथाओं की कसक से, पूर्य वांछित रह गया था
देह जूठी, प्राण पावन, सूर्य तब कलुषित हुआ था

क्या मिलन था उस घड़ी में, डूब कर खोए थे तुम
उस विकलता की घड़ी में, हार कर सोए थे हम

था हमारा स्वप्न कि तुम, चिर जियो अर्धांगिनी बन
मौन होकर आलिंगनों में, फिर बनो वामांगिनी तुम

किंतु देखो चाह मेरी, सत्य से बिल्कुल अलग थी
छल था बस उसमें बसा वह, जीव से बिल्कुल विलग थी

है यही बस कामना अब, आवरण समृद्ध हो
तुम तो मेरी हो न पाई, प्रेम अब अनिरुद्ध हो...

Saturday, 3 November 2018

मैं तुम्हें जब खोजता हूं

निशा के अंतिम पहर में, मैं तुम्हें जब खोजता हूं
राह की वीरानियों में, मैं तुम्हें जब सोचता हूं

सूर्य की अथ दीप्ति सी तुम, प्रीत का त्योहार हो तुम
नीर लेकर मैं नयन में, कह रहा विस्तार हो तुम

तुम तुम्हारे ही हृदय की, एक अविचल कामना हो
प्रेम परिचारक जनों की , तुम कुटिल अवमानना हो

जिस जलधि में अनगढ़े से मोतियों की ज्वार धारा
छद्म कलुषित अर्णवों में, जीव जीता मर न पाया
उस उदधि की चारुता से, शर्बरी से, नेह कर बैठा हूं मैं
इस प्रणय पर नीरदों की, वृष्टि में बहता हूं मैं

कामनाओं की धरा पर, प्रीत की अनुभूति थी तुम
योग के आनन्द की, ही प्रथम संभूति थी तुम
आसक्त थी मुझको तुम्हारी, मधुमास सी उस रम्यता से
किंतु छल से बच न पाया, दंभ निर्मित जन्यता से।

Sunday, 28 October 2018

कौन हो तुम

गृहशोभा की प्रथम किरण हो, प्रज्ञा हो अभिलाषा में
प्रेम, समर्पण, निष्ठ भाव की, अर्थ तुम्हीं परिभाषा में

अंबर का विस्तार तुम्ही हो, सागर सी गहरी हो तुम
वैकल्पिक तुम मार्ग नहीं हो, निशा स्वप्न की प्रहरी तुम

जीवन का तुम अटल सत्य हो, मृगनयनी कस्तूरी हो
प्रेम भावना अर्पण हो तुम, नवरस की तुम धुरी हो...

Tuesday, 30 January 2018

कहानी उस रात की

थी अजब सी कहानी, भी उस रात की
खोकर उसी में, भी छलकी थी तुम

प्रेम कुंदन के मदमस्त, अश्रु जल तले
डूब उसमें, मोहब्बत सी बरसी थी तुम

थीं विधाएं सरस, राग जैसी वही
बर्फ जैसी वहीं, पिघली थी तुम

प्रीति की वह सुधा, याचना सीप सी
सो गई रात थी, खूब जागी थी तुम

चूढ़ियों की खनक, और हृदय की कसक
नेह स्पर्श में, मुस्कुराई थी तुम

प्रश्न था हर्ष का, मन में संघर्ष था
सिलवटों में प्रथम, वह उत्कर्ष था

मुक्तिधामों के उन, आसरों में बंधे
चाहतों के शिविर में, छाई थी तुम

थी अजब सी कहानी, भी उस रात की
हार के क्षार से, विदाई थी तुम

Monday, 29 January 2018

मेरे राम का तुम उपहार हो

मेरी इस कहानी का आधार हो, गौर से देखो तो तुम ही संसार हो।
अकल्पित, अकिंचन, द्रवित प्रेम के, शुभ्र अंचल की तुम ही हरिद्वार हो...

उस निशा की अंधेरी गली में दिखी, दीप्ती रमणी का जैसे करुण सार हो,
विश्व के सूर्य की कांतिमय रोशनी, मानवी श्रेष्ठता का ही विस्तार हो

मिल के बिछड़ी, बिछड़ कर पुनः तुम मिली, नवगीत की तुम अलंकार हो
ख्वाहिशों के अधूरे मिलन में कभी, देखते-देखते तुम ही श्रृंगार हो 

दीर्घ स्वप्नों के कुल में समर्पण लिए, प्रीति इच्छा का जैसे अवतार हो
तोड़ बंधन मिली हो मुझे जब से तुम, लगता जैसे कोई यह चमत्कार हो

राम से मांगता था कि कोई मिले, जिसका मुझसे प्रथम ही सरोकार हो
मिल गई तुम तो मुझको है ऐसा लगा, मेरे राम का तुम उपहार हो