Wednesday, 2 November 2016

नवंबर का महीना

वो प्यारा सा अहसास, अब भी दिल के पास है
वो नवंबर की मुलाकात, आज भी हमको याद है

शरमा के तेरा, मेरी बाहों में बिखर जाना
और जकड़कर मुझको, अपने सीने से लगाना

फिर तेरी खामोश निगाहों में मेरा समा जाना
ये नवंबर याद दिलाता है, तेरे लहजे का सर्द हो जाना

बिछड़ जाने का डर, मिलन की आस लगता है
यही वजह है, जो नवंबर इतना खास लगता है।

तू क्यों बिछड़ी, नहीं अब याद है लेकिन
बस इतना याद है, वो महीना नवंबर था

Wednesday, 10 August 2016

जो तुमने विश्वास भरा...

जीवन के इस कठिन दौर में, जबसे तुमको पाया है
प्रेम पुंज का सूर्य रूप तब, उतर धरा पर आया है।

थी मेरी बस यही कामना, जीवन का आधार बनो तुम
अमिट छाप देकर अतीत की, फिर मेरा संसार बनो तुम।

उस अंबर की परंपरा से, जैसे चांद विरह करता है
तोड़ अमावस की बेड़ी को, पुनः नया यौवन भरता है।

वसुंधरा की इस माटी में, जैसे अप्रतिम प्रेम धरा
धरा रह गया मन में तब वह, जो तुमने विश्वास भरा।

प्रीति-नीति के चक्रों को भी, तोड़ तुम्हें अपनाता हूं
अखिल विश्व का गौरव बनकर, नई कहानी गाता हूं।

फंसकर हार गया था मैं...



प्रेम नहीं था, था मात्र छलावा
जो तुम मुझको दिखलाती थी
थोड़ा हंसकर, फिर मुस्काकर
दिल में बस तुम जाती थी।

तेरे मेरे विरह राग को,
जब भी मैंने गाया था
नयन खुले थे फिर भी उनमें
स्वप्न एक तब आया था।

मेरी हर अभिलाषा में,
प्रश्न मात्र वह होता था
जीवन की परिभाषा में,
निश्छल प्रेम मैं बोता था।

नीति -रीति के व्यूहों से भी,
लड़कर पार गया था मैं
पर तेरी-उसकी मिली भगत में,
फंसकर हार गया था मैं।

जब पापा से ठन जाती है...


यश का दीपक वसुंधरा से, अंबर चढ़ने लगता है,
जीवन के उस शून्य दौर में, प्रेम पुष्प जब खिलता है।

जीवन रूपी व्यथा-कथा को, जब वह सुनने आ जाता है,
अर्ध दुःखों को नयनों में भर, कष्ट मुक्त कर जाता है।

कदम धरा पर रहते तो हैं, मगर गगन पर चलते हैं,
कष्ट भरे जीवन चक्रों में, स्वप्न उसी के पलते हैं।

एक नई जीवन रेखा बन, जब वह जीवन में आती है,
जीवन रूपी आम्र वृक्ष पर, पुनः कली खिल जाती है।

उसी प्रेम के वशीभूत हो, जब पापा से ठन जाती है,
तब शब्दों के जोड़-तोड़ से, फिर कविता बन जाती है।

Wednesday, 13 July 2016

वह समय

काश पुनः वह समय धरा पर, उसी रूप में आ जाता
मनभावन सावन का मौसम, फिर धरती पर छा जाता।

अपने दर्द को मुझसे बांटा, पर मेरा प्रतिकार किया
प्रेम नहीं था मुझसे फिर भी, मुझको वह अधिकार दिया।

वसुंधरा का हृदय चीर कर, प्रेम बीज था बो डाला
बिना किसी के शंका के उस दिन, पी डाला था विष प्याला।

तिमिर मिटाने को जब भी मैं, 'उन' लोगों से लड़ता था
अम्बर में तब प्रचुर प्रेम का, दिनकर ऊपर चढ़ता था।

उच्छृंखल से गौरव को, हां तुमने ही तो योग्य बनाया
लेकिन नहीं समझ पाया मैं, जीवन की वह कोरी माया।

काश पुनः वह समय धरा पर, नए रूप में आ जाता
जिससे चन्द्रप्रभा का वैभव, परमधाम में छा जाता।

Monday, 13 June 2016

मैंने प्रेम किया था उससे....

जीवन के उस लक्ष्यबोध को, नई मिली थी परिभाषा
अंतर्मन के अनुरोध की नहीं मिटी थी अभिलाषा।

तेरे उन झूठे वादों पर मैंने था विश्वास किया
अन्न सरीखे पुञ्जों को तज, मैंने था उपवास किया।

तुमने मुझको कथा सुनाई, अपने अकथित पृष्ठों की
मैंने उसको मान लिया था, रेख समझकर कष्टों की।

तुमने प्रेम किया था उससे, जो तन-वैभव पर मिटता था
मैंने प्रेम किया था उससे, जो स्वप्न लोक में बसता था।

Tuesday, 3 May 2016

आज तुम्हारी बातों ने फिर...

आज तुम्हारी बातों ने फिर, हृदय हमारा तोड़ा है
फिर से तेरे कुछ लफ्जों ने, उसी दौर से जोड़ा है।

याद करो सावन से पुष्पित, उन मनुहारे कथनों को
याद करो स्वप्नों से लक्षित, उन पश्चात्तापी वचनों को।

नहीं कोई अब लक्ष्य बचा है, ना कोई अभिलाषा है
नहीं रहा अस्तित्व कोई अब, ना कोई परिभाषा है।

तो जीवित कैसे रह पाऊंगा...

वही गान है फिर से गाया, मेरे स्वप्न की वाणी ने
एक नया अध्याय जुड़ेगा, मेरी प्रेम कहानी में।

एक नए अनुभव से लक्षित, नई मिलेगी परिभाषा
कहीं अधूरी रह ना जाए, मेरे प्रेम की अभिलाषा।

क्या वही पुरातन नखरे तेरे, मुझको फिर उलझाएँगे
या नए-नए अकथित पन्ने, अब नई कहानी गाएँगे।

नहीं-नहीं फिर से मैं प्रतिकार नहीं कर पाऊंगा
नहीं मिली तुम फिर से तो जीवित कैसे रह पाऊंगा।

Friday, 15 April 2016

इसे मान कर चलना है

विश्वगुरू बन पदम् प्रतिष्ठा को वापस लेकर आएं
अहम् छोड़कर 'राष्ट्रवाद' को जीवन का आधार बनाएं।

राष्ट्र प्रथम है इसी भाव से स्वजन में विश्वास जगाएं
नहीं कोई अब मन्दिर टूटे, मस्जिद का संत्रास मिटाएँ।

सबने कष्ट सहे हैं रण में, इसे मान कर चलना है
सबने जीवन युद्ध लड़ा है, यही भान कर बढ़ना है।

कैसी थी वे रातें...

कैसी थी वे आँखे जिनसे तेरे आंसू बहते थे
कैसी थी वे रातें जिनमें तुमसे दूरी सहते थे।

रही नहीं वो बातें जिनमें जिक्र तुम्हारा होता था
हुआ नहीं वह प्रेम पल्लवित जो तुझमें ही फलता था।

वही लफ़्ज सन्देश बने अब, वही प्रेम की बातें हैं
वही भाव समर्पित होकर, डोर वेदना थामे है।

मेरी अभिलाषा

किसने तुमको याद किया है, जब तुम यह जानोगी
शायद हृदय विखंडित होगा, जब हमको पहचानोगी।

हृदय प्रफुल्लित हुआ सोचकर, तुम अब आने वाली हो
मन विचलित है उसे भोगकर, तुम 'उसको' भाने वाली हो।

कैसा अजब प्रेम था तुमसे, मन में बस तुम बसती थी
कैसा भाव जुड़ा था तुमसे, जब तुम खुलकर हँसती थी।

उसी पुरातन प्रेम से रक्षित, जीवन की अभिलाषा है
तुममें घुलकर उसे बनाऊँ, नाम की जो परिभाषा है।

इसी लक्ष्य से शिखर सजाकर, अब भी तुमको लिखता हूँ
पर यह मत समझो तन सुंदरता, पर मिटता रहता हूँ।

राष्ट्र वंदना परम् अभी भी, जीवन का आधार वही है
भारत को बल देने वाली, सरल ज्ञान की प्यास वही है।

समर वही है अंधियारों से, सावरकर की आस वही है
प्रेम वही है कान्हा जैसा, सीता का विश्वास वही है।

यही राष्ट्र अब विश्वगुरु बन, सबका तमस मिटाएगा
योग, प्रेम, अध्यात्म सिखाकर, सबके मन को भाएगा

बस तुम याद आती हो...

इस अँधेरी रात में बस तुम याद आती हो
आँखें बंद करता हूँ तो तुम ही तो सताती हो

कड़कती धूप से लेकर महकती शाम तक
क्यों मेरा नाम लिख लिख कर मिटाती हो

मेरी आँखों के समन्दर में बस तुम्हारा नाम ही तो है
क्यों किसी बहाने से न तुम मुझ तक अब आती हो।

क्या जल्दी थी मझसे दूर जाकर घर बसाने की
क्या जल्दी है मुझे इतनी जल्दी भुलाने की।

तेरी बातें लिखता था तो कहती थी कि मेरा नाम मत लिखना,
मेरा नाम लिखकर तुम मुझे बदनाम मत करना

कहा था छोड़ दूंगा लिखना जब तक तुम न चाहोगी
आंखों के इशारों से जब तक ना पुकारोगी।

पहाड़ो कि रानी पे जब तुमको बुलाया था
हँसकर तुमने न आने को मजबूरी बताया था

क्या मालूम था मुझको कि तुमने तो बस
बहाना कर के मुझसे पीछा छुड़ाया था।

उस रोज उगते सूरज ने बस यही एहसास दिलाया था
कि ज्यादा शिद्दत से किसी ने तुमको बुलाया था।

इरादा था तुम्हें दिल में बसाऊंगा,
तुम्हें रानी बना करके पलकों पर बिठाउँगा।

अँधेरा दूर करने को मैं सूरज बन गया था
तेरे साथ चलने को मैं निशा से मिल गया था।

इस धरा पर सूरज और निशा का मेल हो नहीं सकता,
और गर मिल जाए सूरज-निशा तो ये जीवन चल नहीं सकता।

जीवन के लिए सूरज का निकलना जरुरी है
और सूरज निकलने को निशा का ढ़लना जरूरी है।

Wednesday, 13 April 2016

जीवन का आधार तुम्हीं थी...

कैसा जीवन है बिन तेरे, कैसे तुमको समझाऊं
नहीं रहा अब प्रेम पुराना, कैसे मन को बतलाऊं।
जीवन की उस नरम डोर को जब से तुमने छोड़ा है
हर पागल दीवाने ने, मुझसे खुद को जोड़ा है
प्रेम राग था बड़ा कठिन पर मैंने उसको गाया था
उसी दौर में एक स्वप्न तब मेरी नींद में आया था।
कैसा था अहसान तुम्हारा, मेरे दिल की हसरत पर
हर आहट दस्तक देती थी, मेरे मन की चौखट पर
मिला था जब भी साथ तुम्हारा, खुद से पार गया था मैं
नहीं मिला जब प्रेम तुम्हारा, खुद से हार गया था मैं
नहीं रुका करता है जीवन, किसी के आने जाने से
प्रेम पल्लवित होता है बस, अपने मन को भाने से
यही दिलासा दी थी तुमने, जब मैं मिलने आया था
'नहीं तुम्हारी जगह कोई अब' कहकर हाथ छुड़ाया था
कैसे तुमको बतलाता कि जीवन का आधार तुम्हीं थी
कैसे तुमको समझाता कि मेरा तो विश्वास तुम्हीं थी

तुम मेरी परिभाषा हो...

तेरी आँखों में डूबा, हृदय प्रफुल्लित हुआ तभी तो
तेरी बाँहों में झूला, शब्द प्रस्फुटित हुआ तभी तो

जीवन का आधार बनी तुम, बसकर मेरी सांसों में
फिर मेरा संसार बनी तुम, आकर मेरी बाँहों में

प्रेमपुंज का दीपक हो तुम, मेरी तुम अभिलाषा हो
मुझको मुझ से मिलाने वाली, तुम मेरी परिभाषा हो

कैसे तुमको नहीं लिखूं मैं, तुम तो मेरी चाहत हो
कलम में पड़ने वाली स्याही, की तुम तो अकुलाहट हो

तुमने जीना सिखलाया, और नजर झुका कर चली गई
फिर इस गौरव की इच्छा, बाजार बीच में छली गई

तुझमें खोकर खुद को पाया, कैसे अहसान चुकाऊंगा
तू भी दूर गई तो बोलो, कैसे जीवित रह पाऊंगा।

ये शब्द नहीं पीड़ाएँ हैं, जीवन के अकथित पृष्ठों की
था प्रेम भरा तुमने आकर, फिर छोड़ मुझे तुम चली गई।

जाना था तो जाती तुम, क्यों सुन्दर स्वप्न वो दिखलाए
क्यों किया दिखावा मुझसे वो, क्यों महल कीर्ति के बिखराए।

था प्रेम तुम्हारा जीवन में, तब मैं खुद में ही पूरा था
बिना तुम्हारे स्वप्न लोक भी, लगता मुझको अधूरा था

तेरी याद आई है....

तेरी वो प्यारी सी मुस्कराहट याद आई है
खुद रोकर मुझे हँसाने की आदत याद आई है
तू नहीं है मेरे साथ अब शायद इसीलिए आज
अपनी वो बचपन वाली चाहत याद आई है।

तेरी हर एक अदा,तेरी एक एक बात
मुझे आज फिर से याद आई है
तेरी दोस्ती का वो वादा और फिर वादे से मुकर जाना
तेरी खुली जुल्फों की याद दिलाने आज ये रात आई है।

तू थी तो सब कुछ था पास मेरे
अब तू नहीं तो कुछ भी नहीं सिवाय मेरे
आज ही के दिन तू मिली थी मुझे 
उस लम्हे का एहसास दिलाने 
 मेरी जेब से तेरी तस्वीर निकल आई है।

तुझे बिना लालच के चाहा मैंने
और तुझे उस चाहत पर विश्वास नहीं है।
तेरा जिस्म ,तेरी बातें और तेरा गुरुर है कुछ खास
पर इसमें से कुछ भी स्थाई नहीं है...

तब तू भी थी पर तुझे एहसास नहीं था
अब एहसास है पर तेरा साथ नहीं है
तेरी कसमों पर तो यकीं न रहा
पर अपने राम पर विश्वास आज भी है।

मेरे विश्वास से आंख मिलाने तेरी याद आई है,
मेरे शब्दों को कविता बनाने तेरी याद आई है....